चित्तौड़गढ़ में निजी स्कूलों की मनमानी! एडमिशन फीस, किताबों और यूनिफॉर्म के नाम पर अभिभावकों से खुली लूट के आरोप

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Arbitrary Practices by Private Schools in Chittorgarh! Allegations of Open Loot of Parents Under the Guise of Admission Fees, Books, and Uniforms.

चित्तौड़गढ़। दिन-ब-दिन शिक्षा महंगी होती जा रही है। बेहतर पढ़ाई और सुविधाओं की उम्मीद में अभिभावक अपने बच्चों को निजी स्कूलों की ओर रुख करते हैं, लेकिन वहां पहुंचते ही उनकी जेब ढीली होने लगती है। बढ़ती फीस, किताबों, यूनिफॉर्म और अन्य खर्चों के बीच अब अभिभावकों को लगने लगा है कि शिक्षा, शिक्षा नहीं रह गई, बल्कि शिक्षा की आड़ में धंधा और कमाई का जरिया बनती जा रही है।

शहर सहित पूरे जिले में निजी विद्यालयों की फीस व्यवस्था को लेकर अभिभावकों में लगातार नाराजगी बढ़ती जा रही है। कई निजी स्कूलों पर हर साल विद्यार्थियों से दोबारा एडमिशन फीस वसूलने, महंगी किताबें खरीदने के लिए बाध्य करने और यूनिफॉर्म के नाम पर तय दुकानों से खरीदारी कराने जैसे गंभीर आरोप लग रहे हैं। अभिभावकों का कहना है कि जब विद्यार्थी पहले से ही उसी स्कूल में अध्ययनरत है तो हर वर्ष नई कक्षा में प्रवेश पर एडमिशन फीस लेना अनुचित है।

अभिभावकों के अनुसार कई निजी स्कूलों द्वारा किताबों का ठेका एक ही दुकानदार को दिया जाता है, जहां बाजार भाव से कहीं अधिक कीमत पर पुस्तकें बेची जाती हैं। यही स्थिति स्कूल ड्रेस को लेकर भी सामने आ रही है। कई स्कूलों में यूनिफॉर्म केवल तय दुकान से ही लेने का दबाव बनाया जाता है, जिससे अभिभावक मजबूरी में महंगे दाम चुकाने को विवश हैं।

अभिभावकों का आरोप है कि किताबों और यूनिफॉर्म की बिक्री पर विद्यालय प्रबंधन को करीब 20 से 30 प्रतिशत तक कमीशन मिलता है। इसी कारण चुनिंदा दुकानदारों को ठेका देकर उनकी मोनोपोली बनाई जाती है, जबकि इसका सीधा आर्थिक बोझ विद्यार्थियों और उनके परिजनों पर पड़ता है।

संस्थागत और ट्रस्ट के पैसे से चलने वाले कई स्कूल भी इससे अछूते नहीं है इनपर भी मनमानी फीस वसूलने और अतिरिक्त खर्च थोपने के आरोप लग रहे हैं। फीस और सामग्री व्यवस्था को लेकर अभिभावक लगातार सवाल उठा रहे हैं। हालांकि संबंधित स्कूल प्रबंधन की ओर से इस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

अभिभावकों का कहना है कि आम आदमी अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाने के लिए निजी स्कूलों का रुख करता है, लेकिन वहां फीस और अतिरिक्त खर्चों का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है। कई परिवार आर्थिक दबाव में आ चुके हैं।

वहीं आरटीई (Right to Education) के तहत प्रवेश को लेकर भी कई स्कूलों पर टालमटोल करने और विभिन्न बहाने बनाने के आरोप लगते रहे हैं। अभिभावकों का कहना है कि जिला शिक्षा अधिकारी और प्रशासन को इस पूरे मामले की जांच कर सख्त कार्रवाई करनी चाहिए ताकि शिक्षा के नाम पर हो रही मनमानी पर रोक लग सके।

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Ilyas
Author: Ilyas

पिछले 10 वर्षों से सक्रिय पत्रकारिता

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