Roadways Headquarters’ Orders Flouted; Serious Allegations Leveled Against Chief Manager of Chittorgarh Depot

चित्तौड़गढ़, 20 अप्रैल। राजस्थान राज्य पथ परिवहन निगम के चित्तौड़गढ़ आगार में नियमों को ताक पर रखकर मनमर्जी का एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने मुख्यालय की कार्यप्रणाली और अनुशासन पर सवालिया निशान लगा दिए हैं। रोड़वेज सेवानिवृत्त कर्मचारी संघ का आरोप है कि मुख्यालय जयपुर द्वारा जारी निलंबन आदेशों को चित्तौड़गढ़ आगार के मुख्य प्रबंधक राकेश सारस्वत ने ठंडे बस्ते में डाल दिया और एक माह तक निलंबित कर्मचारी से मार्ग पर ड्यूटी कराई गई। रोडवेज मुख्यालय द्वारा आदेश क्रमांक 308 30 अप्रेल 25 के तहत चार परिचालकों को निलंबित किया गया था। इस आदेश के अनुसार इन परिचालकों का मुख्यालय भी अन्य आगारों में परिवर्तित किया गया था। इसी क्रम में चित्तौड़गढ़ आगार के परिचालक प्रदीप सिंह को निलंबित कर उनका मुख्यालय राजसमंद आगार किया गया था। जहाँ एक ओर प्रदेश के अन्य आगारों ने मुख्यालय के आदेश की पालना करते हुए संबंधित परिचालकों को तुरंत कार्यमुक्त कर उनके नए मुख्यालय भेज दिया, वहीं चित्तौड़गढ़ आगार में कहानी कुछ और ही थी। निलंबित होने के बावजूद परिचालक प्रदीप सिंह को एक माह से अधिक समय तक लगातार मार्ग पर ड्यूटी पर भेजा जाता रहा। आरोप है कि मुख्य प्रबंधक और अधीनस्थ अधिकारियों की मिलीभगत से इस निलंबन आदेश को दबाए रखा गया। मामले में नया मोड़ तब आया जब 03 जून 2025 को आदेश संख्या 415 के द्वारा मुख्यालय ने चारों परिचालकों को बहाल कर दिया। सूत्रों के अनुसार अपनी लापरवाही और अनियमितता को छिपाने के लिए चित्तौड़गढ़ आगार प्रबंधन ने आनन-फानन में पुराने निलंबन आदेश पर मार्किंग कर परिचालक के हस्ताक्षर करवाए, ताकि यह दिखाया जा सके कि आदेश की जानकारी देरी से मिली। यह तकनीकी रूप से असंभव प्रतीत होता है कि एक ही आदेश प्रदेश के अन्य आगारों में समय पर पहुँच गया और वहाँ पालना भी हो गई, लेकिन चित्तौड़गढ़ आगार में इसे प्राप्त होने में एक महीना लग गया। रोड़वेज सेवानिवृत्त कर्मचारी संघ ने इस पूरे प्रकरण की उच्च स्तरीय जांच की मांग की गई है। उपस्थिति पंजिका और मार्ग पत्रक 30 अप्रैल से 3 जून के बीच परिचालक की ड्यूटी की जांच, मुख्यालय से ई-मेल या डाक के माध्यम से आदेश पहुँचने के वास्तविक समय का मिलान, आदेश को दबाने वाले अधिकारियों और लिपिकों के विरुद्ध सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई। यदि मुख्यालय के आदेशों की इसी प्रकार अवहेलना होती रही, तो निगम में अराजकता का माहौल पैदा होगा। इस मामले में मुख्य प्रबंधक की भूमिका संदिग्ध नजर आ रही है, जिसकी निष्पक्ष जांच कर दोषियों को दंडित किया जाना आवश्यक है ताकि भविष्य में ऐसी पुनरावृत्ति न हो।
यह खबरें भी पढ़ें…







