चित्तौड़गढ़ में सफाई व्यवस्था चरमराई, जगह-जगह कचरे के ढेर और आवारा मवेशियों का आतंक, टूटी सड़के, बदहाल व्यवस्था

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चित्तौड़गढ़ शहर की सफाई व्यवस्था दिनों-दिन बदहाल होती जा रही है। मुख्य सड़कों से लेकर कॉलोनियों तक गंदगी के ढेर लगे हैं। प्रतापनगर रेलवे स्टेशन लिंक रोड पर पिछले कई दिनों से कचरे का ढेर लगा हुआ है, जिसमें रेलवे कर्मचारियों द्वारा स्टेशन का कचरा भी मिलाया जा रहा है।

 

इस गंदगी के कारण आवारा सांड और कुत्ते हर समय मंडराते हैं जिससे दुर्घटनाओं का खतरा कई गुना बढ़ गया है। शहर की सड़कों पर पैच वर्क का काम महज दो माह पहले हुआ था लेकिन बारिश में सब बह गया, अब गड्ढे ही गड्ढे नजर आते हैं।

 

वहीं, नालियों की सफाई न होने और गंदगी के कारण डेंगू, मलेरिया जैसी बीमारियों का खतरा मंडरा रहा है। कॉलोनियों में सफाई कर्मी हफ्तों तक नहीं पहुंचते।

 

रात होते ही अंधेरे में डूब जाती हैं सड़कें और पार्क, क्योंकि विद्युत पोलों की आधी से ज्यादा लाइटें बंद हैं।

 

बाजारों में फिर से अतिक्रमण लौट आया है, खासकर प्रतापनगर, नेहरू नगर और रेलवे स्टेशन चौराहे जैसे इलाकों में। प्रशासन की कार्रवाई सवालों के घेरे में है।

 

सवालों के घेरे में सफाई, सड़कों और अतिक्रमण पर नगर परिषद की कार्यप्रणाली

चित्तौड़गढ़ नगर परिषद की कार्यशैली पर अब जनता सवाल उठा रही है। जहां एक ओर शहर स्मार्ट बनने की ओर बढ़ रहा है, वहीं दूसरी ओर गंदगी, टूटी सड़कें, अतिक्रमण और खराब लाइटों की वजह से आमजन रोज परेशान हैं।

 

प्रतापनगर रेलवे स्टेशन लिंक रोड, नेहरू नगर चौराहा और कई प्रमुख क्षेत्रों में महीनों से कचरे के ढेर लगे हैं, जिससे दुर्गंध और मवेशियों के कारण खतरा लगातार बना हुआ है।

 

हाल ही में कुछ क्षेत्रों में अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई हुई थी, लेकिन वह सिर्फ दिखावे की लग रही है क्योंकि बाजारों में फिर से अतिक्रमण ने वापसी कर ली है।

क्या नगर परिषद को सिर्फ कागजों में कार्रवाई करनी है? क्या आमजन की समस्याएं सुनने वाला कोई नहीं?

 

“चित्तौड़गढ़ शहर, जिसे कभी स्वच्छता में अग्रणी बनाने के सपने देखे गए थे, आज गंदगी और अव्यवस्था से जूझ रहा है।”

 

“मुख्य सड़कों से लेकर मोहल्लों तक, जगह-जगह कचरे के ढेर लगे हैं। सफाईकर्मी आते भी हैं तो कचरा उठाकर सड़क किनारे ही डाल देते हैं।”

 

“प्रतापनगर रेलवे स्टेशन लिंक रोड पर तो हालात और भी भयावह हैं, जहां रेलवे का कचरा भी खुले में फेंका जा रहा है, और सांड व आवारा मवेशी दिनभर मंडराते रहते हैं।”

 

“इसी गंदगी से उठती बदबू, सड़कों पर फैले गड्ढे, और आधी रात में डूबे अंधेरे इलाके – शहर की असली तस्वीर पेश कर रहे हैं।”

 

“नगर परिषद ने कुछ समय पहले अतिक्रमण हटाया था, लेकिन वो भी अब फिर से वापस आ गया है।”

 

“कॉलोनियों की नालियों में भरा कचरा और बढ़ते मच्छर – क्या हम डेंगू और मलेरिया के खतरे को न्यौता दे रहे हैं?”

 

“सवाल ये है – क्या नगर परिषद को दिखाई नहीं देता ये हाल, या जनता की समस्याएं अब सिर्फ चुनावी मुद्दा भर रह गई हैं?”

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Ilyas
Author: Ilyas

पिछले 10 वर्षों से सक्रिय पत्रकारिता

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