नई दिल्ली। भारत को आज विश्व की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक ताकत माना जाता है। करोड़ों नागरिक हर पांच साल में मतदान कर सरकार चुनते हैं और संविधान ने सभी को समान अधिकार दिए हैं। लेकिन इसी लोकतंत्र पर सबसे बड़ा खतरा भ्रष्टाचार के रूप में मंडरा रहा है। भ्रष्टाचार वह बीमारी है जिसने शासन-प्रशासन की जड़ों को कमजोर कर दिया है। छोटे सरकारी कामों से लेकर बड़े प्रोजेक्ट तक, रिश्वतखोरी आम हो गई है।
लाइसेंस बनवाने, सरकारी अस्पतालों में इलाज कराने, पुलिस थाने में एफआईआर दर्ज कराने या फिर योजनाओं का लाभ पाने के लिए आम आदमी को घूस देने की मजबूरी झेलनी पड़ती है। कई बार गरीब और असहाय लोग पैसे न होने के कारण अपने हक से भी वंचित रह जाते हैं। यही वजह है कि भ्रष्टाचार को देश के विकास में सबसे बड़ी रुकावट माना जाता है।

विशेषज्ञ मानते हैं कि भ्रष्टाचार की सबसे बड़ी जड़ ‘जवाबदेही की कमी’ है। अक्सर अधिकारी और कर्मचारी अपनी जिम्मेदारियों से बच निकलते हैं और कानून का डर न होने से भ्रष्टाचार फैलता चला जाता है। सरकारों ने समय-समय पर लोकपाल, लोकायुक्त, सतर्कता आयोग जैसी संस्थाएं बनाई हैं, लेकिन इनके प्रभावी क्रियान्वयन पर सवाल उठते रहे हैं।
अंतरराष्ट्रीय संस्था ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की रिपोर्ट के अनुसार भारत अब भी भ्रष्टाचार सूचकांक में पिछड़ा हुआ है। इसका सीधा असर निवेश, शिक्षा, स्वास्थ्य और न्याय व्यवस्था पर पड़ता है। योजनाओं का बजट तो खर्च हो जाता है लेकिन लाभ अंतिम छोर तक नहीं पहुंच पाता।
आज आवश्यकता है कि नागरिक जागरूक होकर भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाएं और प्रशासनिक व्यवस्था को अधिक पारदर्शी बनाया जाए। ई-गवर्नेंस, डिजिटल पेमेंट और ऑनलाइन सेवाओं ने कुछ हद तक पारदर्शिता लाई है, लेकिन जब तक कड़े कानूनों के साथ सख्त अमल नहीं होगा, तब तक यह बुराई पूरी तरह खत्म नहीं हो पाएगी।
*“आज़ादी से अब तक के बड़े घोटाले: कैसे हिलती रही व्यवस्था की नींव”*
भारत में भ्रष्टाचार का इतिहास आज़ादी के बाद से ही गहराता चला गया है। शुरुआती दौर में हरिदास मुंद्रा कांड (1957) जैसे वित्तीय घोटाले सामने आए, फिर समय के साथ जीप घोटाला, सुखराम टेलीकॉम घोटाला, हर्षद मेहता स्टॉक स्कैम (1992), जैन हवाला कांड (1996) और कोयला घोटाला (2012) जैसे मामलों ने पूरे देश को हिला दिया। इनमें हजारों-करोड़ रुपये के सरकारी खजाने का दुरुपयोग हुआ और जनता का भरोसा व्यवस्था से डगमगाया।
पिछले दो दशकों में 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला, कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाला, विजय माल्या और नीरव मोदी जैसे आर्थिक अपराध देश की छवि को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी धूमिल कर गए। इन मामलों ने यह साबित किया कि जब तक शासन और प्रशासन पारदर्शी नहीं होगा, तब तक लोकतंत्र मजबूत नहीं हो सकता।
*“वर्तमान में बढ़ता भ्रष्टाचार और महंगाई: जनता की जेब पर दोहरी मार”*
वर्तमान में भी भ्रष्टाचार थमने का नाम नहीं ले रहा है। फर्जी नियुक्तियां, टेंडरों में हेरफेर, चिकित्सा क्षेत्र में घोटाले और योजनाओं के बजट की बंदरबांट लगातार हो रही है। इसका सीधा असर आम जनता पर पड़ रहा है। महंगाई रोज़मर्रा की जिंदगी को और मुश्किल बना रही है। पेट्रोल-डीजल, गैस सिलेंडर, खाद्य पदार्थों और बिजली-पानी के बढ़ते दाम आम नागरिक के बजट को तोड़ रहे हैं। लोग सवाल पूछते हैं कि जब सरकार अरबों-खरबों रुपये के घोटालों को रोक नहीं पा रही, तो महंगाई पर नियंत्रण कैसे होगा?
सरकार को अब सिर्फ बयानबाज़ी से आगे बढ़कर ठोस कदम उठाने होंगे। बड़े घोटालों की स्वतंत्र और पारदर्शी जांच, दोषियों को कड़ी सज़ा, डिजिटल गवर्नेंस और जनता की निगरानी जैसे उपाय ही भ्रष्टाचार की जड़ों को हिला सकते हैं।
भारत की प्रगति तभी संभव है जब भ्रष्टाचार पर कड़ी लगाम लगे और पारदर्शिता व्यवस्था की बुनियाद बने। अब वक्त है कि सरकार और समाज मिलकर इस बीमारी के खिलाफ निर्णायक लड़ाई लड़ें।
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Author: chittorgarhnews
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