नई दिल्ली। भारत में पेट्रोल में 20% एथेनॉल मिश्रण (E20) लागू किए जाने के बाद से इस नीति को लेकर लगातार चर्चा और सवाल खड़े हो रहे हैं।

सरकार का दावा है कि यह कदम पर्यावरण संरक्षण और आयातित ईंधन पर निर्भरता घटाने की दिशा में बड़ा सुधार है। लेकिन कई वाहन उपभोक्ताओं और विशेषज्ञों का कहना है कि पुराने वाहनों में E20 इस्तेमाल करने पर माइलेज 2–4% तक घटा है और इंजन की परफॉर्मेंस पर भी असर महसूस किया जा रहा है।
उधर, मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक कुछ एथेनॉल कंपनियों की आय में हाल के महीनों में तेज़ उछाल देखने को मिला है। एक कंपनी की तिमाही आय पिछले साल के लगभग ₹17 करोड़ से बढ़कर इस साल ₹500 करोड़ से ऊपर पहुँच गई। इससे यह सवाल भी उठ रहे हैं कि क्या नीति से सीधे तौर पर कुछ चुनिंदा कंपनियों को बड़ा लाभ हुआ है। ये कंपनिया केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी के बेटों की बताई जा रही है।
विपक्षी दलों का कहना है कि इस नीति को लागू करने से पहले लंबा ट्रायल होना चाहिए था और ऐसी गाड़ियों को पहले बाज़ार में उपलब्ध कराना ज़रूरी था, जो E20 ईंधन को पूरी तरह सपोर्ट कर सकें।
परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने इन आलोचनाओं को खारिज करते हुए कहा है कि एथेनॉल मिश्रण को पूरी तरह परीक्षण के बाद ही लागू किया गया है और इससे ईंधन की कीमतों व पर्यावरण दोनों को लाभ मिलेगा। हालांकि, उपभोक्ताओं का अनुभव और ज़मीन पर दिख रहे नतीजे कई बार इन दावों से मेल नहीं खा रहे हैं।
उठते सवाल
- क्या E20 लागू करने से पहले आम जनता की गाड़ियों पर व्यापक ट्रायल किया गया था?
- क्या पेट्रोल-डीज़ल की कीमतों में वाकई आम उपभोक्ता को राहत मिली है?
- और क्या कंपनियों की तेज़ी से बढ़ती कमाई केवल बाज़ार की मांग का नतीजा है या नीति से सीधे जुड़ा लाभ?
एथेनॉल नीति का उद्देश्य निश्चित तौर पर सकारात्मक और पर्यावरण हितैषी है, लेकिन इसके लागू होने का तरीक़ा और उसके परिणाम अभी भी बहस का विषय बने हुए हैं। जनता को भरोसा दिलाने के लिए ज़रूरी है कि सरकार इस पूरे मामले में अधिक पारदर्शिता दिखाए और उपभोक्ताओं की शंकाओं का सीधा जवाब दे।
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