Humanity, a shift in mindset, and the values instilled in the youth will determine the country’s future: Acharya 108 Pulak Sagar Maharaj.

चित्तौड़गढ़, 8 जुलाई। ज्ञान गंगा महोत्सव के दूसरे दिन आयोजित पत्रकार वार्ता में राष्ट्रसंत आचार्य श्री 108 पुलक सागर जी महाराज ने मानवता, धर्म, युवाओं के भविष्य, सामाजिक मूल्यों और वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों पर विस्तार से अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि आज दुनिया अभूतपूर्व वैज्ञानिक प्रगति कर चुकी है, लेकिन इंसानियत और मानवीय मूल्यों के क्षेत्र में अभी भी बहुत पीछे है।
आचार्य श्री ने कहा कि “हम अंतरिक्ष में पक्षियों की तरह उड़ना सीख गए, मछलियों की तरह पानी में तैरना सीख गए, लेकिन धरती पर इंसान की तरह जीना नहीं सीख पाए। हमने मंदिर और मस्जिद तो बहुत बना लिए, लेकिन अपने मन को मंदिर नहीं बना पाए।”
उन्होंने कहा कि उनका एक ही सपना है कि समाज में इंसानियत की स्थापना हो। “मोहब्बत की मस्जिदें हों और प्रेम के मंदिर बनाए जाएँ।” उन्होंने कहा कि आज पूरा विश्व युद्ध, हिंसा, प्रदूषण और विषाक्त वातावरण जैसी अनेक चुनौतियों से जूझ रहा है और यदि इन समस्याओं का स्थायी समाधान कहीं है तो वह भगवान महावीर के दया, करुणा, अहिंसा और आत्मसंयम के संदेश में है।
आचार्य श्री ने कहा कि देश को मजबूत बनाने के लिए मजबूत समाज और मजबूत व्यक्तित्व का निर्माण आवश्यक है। इसी उद्देश्य से चित्तौड़गढ़ में ज्ञान गंगा महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है, जहां लोग बड़ी संख्या में आकर धर्म, संस्कार और जीवन मूल्यों को सुन रहे हैं। उन्होंने कहा कि वैचारिक परिवर्तन ही सबसे बड़ी आवश्यकता है। परिवर्तन कोई दूसरा नहीं ला सकता, प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं अपने भीतर परिवर्तन करना होगा।
पत्रकारों द्वारा पूछे गए एक प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा कि बुराई जब बुराई के रूप में सामने आती है तो उससे मुकाबला आसान होता है, लेकिन जब बुराई अच्छाई का रूप धारण कर लेती है तो उसे पहचानना और उससे बचना सबसे कठिन हो जाता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि रावण अपने वास्तविक स्वरूप में आता तो माता सीता कभी उसके छल का शिकार नहीं होतीं, लेकिन वह साधु का वेश धारण करके आया और धोखा देने में सफल हुआ। उन्होंने कहा कि आज भी समाज को छल और भ्रम से सावधान रहने की आवश्यकता है।
आचार्य श्री ने वर्तमान सामाजिक वातावरण पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि यदि यही स्थिति बनी रही तो आने वाले समय में युवा पीढ़ी धर्म और संस्कारों से दूर हो सकती है। उन्होंने कहा कि आज युवाओं के पास गति तो है, लेकिन दिशा का अभाव है। केवल जल्दी और अधिक पाने की दौड़ व्यक्ति को दिशाहीन बना देती है।
उन्होंने युवाओं से धन के प्रति संतुलित दृष्टिकोण अपनाने का आह्वान करते हुए कहा कि दुनिया का सारा धन यहीं रह जाता है। चित्तौड़गढ़ का विशाल दुर्ग आज भी इसका साक्षी है कि वैभव और संपत्ति यहीं रह जाती है, जबकि मनुष्य खाली हाथ आता है और खाली हाथ ही जाता है। उन्होंने कहा कि यदि युवा इस सत्य को समझ लें तो वे कभी गलत मार्ग पर नहीं जाएंगे।
आचार्य श्री ने कहा कि बेईमानी से सफलता तो मिल सकती है, लेकिन शांति कभी नहीं मिल सकती। बेईमानी से भोजन तो मिल सकता है, लेकिन भूख नहीं; पानी मिल सकता है, लेकिन प्यास नहीं मिटती। उन्होंने कहा कि इतिहास केवल धनवानों का नहीं, बल्कि भगवान श्रीराम जैसे आदर्शों का भी है। समाज धन से अधिक आदर्शों को सम्मान देता है, इसलिए मंदिर भी आदर्शों के बनते हैं।
उन्होंने आधुनिक जीवनशैली और सोशल मीडिया पर भी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज का युवा फेसबुक और इंस्टाग्राम पर हजारों मित्र बना रहा है, लेकिन अपने ही परिवार से संवाद कम होता जा रहा है। उन्होंने कहा कि मित्रों की लंबी सूची में कई बार माता-पिता के लिए समय और सम्मान नहीं बचता। युवाओं को सबसे पहले अपने माता-पिता की कीमत समझनी चाहिए और उनके साथ आत्मीय संबंध बनाए रखने चाहिए।
पत्रकार वार्ता के अंत में आचार्य श्री ने चित्तौड़गढ़ के युवाओं से जीवन में धर्म, संस्कार, मानवता और नैतिक मूल्यों को अपनाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि राष्ट्र और समाज का उज्ज्वल भविष्य केवल आर्थिक प्रगति से नहीं, बल्कि चरित्र, करुणा, संस्कार और वैचारिक परिवर्तन से निर्मित होगा।
पत्रकार वार्ता में चित्तौड़गढ़ के विभिन्न मीडिया संस्थानों के प्रतिनिधियों के साथ सकल दिगंबर जैन समाज के पदाधिकारी एवं बड़ी संख्या में समाजजन उपस्थित रहे।
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Author: Ilyas
पिछले 10 वर्षों से सक्रिय पत्रकारिता







